बलिदानी राजा


प्राचन काल की बात है, केाशल देश के राजा बहुत महान् थे। वह अपनी प्रजा का बहुत ख्‍याल रखते थे। प्रजा भी उन्‍हें अपना पिता मानती थी। चारों ओर उनके यश के गीत गाये जाते थे।
    आज उनका जन्‍म-दिवस है। पङोसी राज्‍य्‍ काशी में जगह-जगह पर दीये जलाये जा रहे हैं। मंदिरों में घंटे बज रहे हैं। लोग भजन गा रहे हैं तथा ‘कोशलराज की जय’ के नारे लगा रहे हैं।
    काशीराज ने कहा-आज यह त्‍यौहार क्‍यों मनाया जा रहा है?
    प्रधानमंत्री ने बताया-आज कोशल देश के महाराज का जन्‍म-दिवस है।
    मेरी प्रजा कोशल के राजा को इतनी इज्‍जत क्‍यां दे रही है?
    प्रधानमंत्री ने विनम्रता से कहा-राजन्! प्रजा के हितैषी तथा दयालु राजा का राज सिर्फ अपने देश तक ही सीमित नहीं रहता। वह तो दूसरे राज्‍यों की प्रजा के मनों में भी राज करता है। उसके राज की सीमाएँ तो लोगों के ह्रदय को छूती हैं।

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    ईर्ष्‍या से काशीराज का मन जल उठा। दाँत पीसते हुए उन्‍होंने कहा-अच्‍छा, तो यह बात है।
    अचानक ही कोशल देश पर काशी की सेना ने हमला बोल दिया। सेना के आगे-आगे स्‍वयं काशीराज चल रहे थे।
    कोशलराज की सेना काफी छोटी थी। वह क्‍या कर सकते थे! तलवार हाथ में ले, स्‍वयं जंग में कूद पङे। युद्ध हार गये तथा शर्म के मारे जंगल में चले गये। उधर काशीराज अपनी विजय की खुशी से फुले नहीं समा रहे थे।
    कोशल-नरेश की हार से काशी की प्रजा निराश हो उठी। प्रत्‍येक घर में अंधेरा छा गया था। इससे काशीराज के दिल में ईर्ष्‍या की तेज ज्‍वाला धधक उठी। पूरे राज्‍य में ढिंढोरा पिटवा दिया-जो भी कोशलराज का सिर काटकर लायेगा, उसे सवा मन सोना दिया जायेगा।
    वन में एक आदमी भटक रहा था। उसके निकट आकर एक यात्री ने पूछा-हे वनवासी! कोशल देश को कौनसा मार्ग जाता है?
हे यात्री, तुम पर ऐसी कौन-सी मुसीबत आ पङी जो तुम दूसरे सुखी देशों को छोङकर लुटे-पिटे कोशल देश को पूछ रहे हो?
    यात्री ने बातया-हे भाई! मैं एक बङा व्‍यापारी था। मेरे सभी जहाज तूफान में फँसकर सागर में डूब गये। मुझ पर कर्ज बाकी है। पीङित होकर मैंने मर जाना चाहा, मगर कर्ज चुकाये बगैर मरना भी ठीक नहीं। इसलिए मैं कोशल-देश का मार्ग पूछ रहा हूँ। मैं वहाँ जाकर कोशलराज के सामने अपनी आप-बीती कहँगा। वह इतने रहमदिल हैं कि मेरी मदद जरूर करेंगे। उस धन से मैं अपने चौपट धंधे को फिर जमाऊँगा तथा सिर से कर्ज का बोझ उतारूँगा।
यह सुनकर वनवासी के मुख पर चमक आ गई। उसकी आँखें गीली हो उठीं। उसने बताया, आओ दोस्‍त मेरे साथ चलो। तुम्‍होर दु:ख दूर होगे।
दोनों काशी नगरी में जाकर राजदरवार में पहुँचे। उस जटाधारी वनवासी का माथा तेज से चमक रहा था। काशीराज की दृष्टि उस पर टिक गयी। पूछा-कौन हो तुम? क्‍यों आये हो?
    वनवासी-महाराज! आपके लिए एक खुशखबरी लाया हूँ।
    क्‍या?
    कोशलराज के शीश लाने वाले को आप क्‍या देंगे?
    कहाँ है? किधर है? जल्‍दी ला। सवा मन.....नहीं ढाई मन सोना दूंगा।
    कहाँ है वह शीश.....?
    महाराज! ढाई मन सोना तुलवाकर इस व्‍यापारी को सौंप दी‍‍जिये और यह सिर प्रसन्‍नता से कटवा दीजिये।
काशीराज की दृष्टि हैरत से फटी रह गयी। वह पत्‍थर की मूर्ति बने देखते रह गये।
    पहचानते नहीं काशीराज! क्‍या इतनी शीघ्र भूल गये? जरा गौर कीजिए। यह कोशलराज का ही शीश है।
    कोशल-नरेश, यह मैं क्‍या देख रहा हूँ? यह सत्‍य है अथवा सपना?
    आश्‍यर्च मत पङिये काशीराज, यह सत्‍य है। चलिये, देर न करो। मेरे सिर को धङ से उङवाकर इस व्‍यापारी की लाज बचाइये।
    देर तक काशीराज ठगे-से बैठे रह गये-और फिर मुस्‍कराये। फिर कहा-आप धन्‍य हैं कोशलराज! मेरे अभिमान को तोङने के पश्‍चात् अब आप मुझ पर सम्‍पूर्ण विजय हासिल करने के लिए यह चाल आजमा रहे हैं! नहीं-नहीं, अब नहीं जीत सकेंगे आप मुझसे। मैं आपकी इस बाजी को पलट दूंगा।
    इतना कहकर वह उठे। उस वनवासी को स्‍वयं मुकुट महनाया। उसे अपने साथ सिंहासन पर बैठाया। फिर खङे होकर हाथ जोङकर कहा-हे कोशल-नरेश! मैं आपको आपका राज्‍य तो लौटाता ही हूँ, लेकिन उसके साथ अपना दिल भी आपको भेंट करता हूँ। तलवार की धार पर नहीं, अपने दिल की धार पर।
बलिदानी राजा बलिदानी राजा Reviewed by Kahaniduniya.com on अक्तूबर 16, 2019 Rating: 5

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