खोया हुआ मोती

मैंने अपनी नाव का स्‍नानघाट की टूटी-फूटी सीढियों के पास लंगर डाला। सूर्य छिप चुका था। नाविक नाव के तख्‍ते पर ही मगरिब (सूर्यास्‍त) की नमाज अदा करने लगा। हर सजदे के बाद उसकी काली छाया सिंदूरी आसमान के नीचे एक चमक के समान खिंच जाती।
नदी के तट पर एक टूटी-फूटी इमारत खङी थी, जिसका छज्‍जा इस तरह झुका हुआ था कि उसके गिर पङने की हर समय भारी शंका रहती थी। उसके दरवाजो और खिङकियों के किवाङ बहुत प्राचीन और ढीले हो चुके थे। चारों तरफ शून्‍यता छाई हुई थी। उस शून्‍य वातावरण में अचानक एक व्‍यक्ति की आवाज मेरे कानों में सुनाई पङी तो मैं कॉप उठा।
आप किधर से आ रहे हैं?
मैंने गर्दन घुमाकर देखा तो एक पीले, लम्‍बे और बुढे आदमी की सूरत दिखाई पङी जिसकी हड्डियाँ निकली हुई थीं, दुर्भाग्‍य से लक्षण सिर से पैर तक प्रतीत हो रहे थे। वह मुझसे मात्र दो-चार सीढियाँ ऊपर खङा था। सिल्‍क का मैला कोट तथा उसके नीचे एक मैली-सी धोती बाँधे हुए। उसका दुर्बल शरीर, उतरा हुआ मुख और ल्रङखङाते हुए कदम बता रहे थे कि उस क्षुधा पीङित मनुष्‍य को शुद्ध हवा से ज्‍यादा भोजन की आवश्‍यकता है।
मैंने राँची से वापस आ रहा हॅू।
यह सुनकर वह मेरे बराबर में उसी सीढी पर आ बैठा।
और आपका कार्य?
कारोबार करता हूँ।
किस वस्‍तु का ?
इमारती लकङी, रेशम तथा त्रिफला का।  
आपका नाम क्‍या है?
एक क्षण सोचने के पश्‍चात् मैंने अपना एक कृत्रिम नाम बता दिया।
लेकिन वह मुझे एकटक देखता रहा।
मगर आपका यहाँ आना कैसे हुआ? केवल मनोरंजन के लिए या फिर वायु परिवर्तन के वास्‍ते?
मैंने बताया-वायु परिवर्तन के लिए।
यह भी खूब रही। मैं लगभग छ: साल से रोजाना यहॉ की जाती हवा पेट भरकर खा रहा हॅू और साथ ही पन्‍द्रह ग्रेन कुनैन भी, मगर अन्‍तर कुछ नहीं हुआ। कोई फायदा दिखाई नहीं देता।’’
रांची और यहॉ की जलवायु में तो जमीन और आसमान का अन्‍तर है।  
इसमें सन्‍देह नहीं, किन्‍तु आप यहॉ ठहरे किस स्‍थान पर हैं? क्‍या इसी मकान में?
शायद उस आदमी को संदेह हो गया था कि मुझे उसके किसी गङे हुए धन का कहीं से सुराग मिल गया है और मैं उस स्‍थान पर ठहरने के लिए नहीं, बल्कि उसके गङे हुए धन पर अपना हक जमाने आया हूँ। मकान की भलाई-बुराई के सम्‍बन्‍ध में एक शब्‍द तक कहे बिना उसने अपने उस मकान के स्‍वामी की पन्‍द्रह साल पहले की एक कहानी सुनानी शुरू कर दी-
उसकी गंजी खोपङी में गहरी तथा चमकदार काली आँखें मुझे कॉलरिज के पुराने नाविक की याद दिला रही थीं। वह एक स्‍थानीय स्‍कूल में टीचर था। नाविक ने समाज से अलग होकर रोटी बनानी शूरू कर दी। सूर्यास्‍त होने के वक्‍त आकाश के सिंदूरी रंग पर हक जमाने वाली अंधेरी मे वह खण्‍डहर भवन एक विचित्र-सा भयानक नजारा प्रदर्शित कर रहा था।
मेरे पास सीढी पर बैठे हुए उस बुबले तथा लम्‍बे स्‍कूल मास्‍टर ने कहा-मेरे इस गाँव में आने से लगभग दस वर्ष पहले एक आदमी फणीभूषण सहाय इस मकान मे रहता था। उसका चाचा दुर्गामोहन बिना अपने किसी उत्तराधिकारी के मर गया। जिसकी पूरी जमीन-जायदाद तथा लम्‍बा-चौङा व्‍यापार का अकेला वही अधिकारी था।
पाश्‍चात्‍य्‍ शिक्षा नई सभ्‍यता का भूत फणीभूषण पर सवार था। कॉलेज में कई वर्षो तक वह शिक्षा हासिल कर चुका था। वह अंग्रेजों की तरह कोठी में जूता पहने फिरा करता था, यह कहने की जरूरत नहीं कि ये लोग उनके साथ कोई व्‍यापारिक रियायत देने के रवादार न थे। वे भली तरह जानते थे कि फणीभूषण आखिर को नये बंगाल की वायु में सांस ले रहा हैं।
इसके अतिरिक्‍त एक और बला उसके सिर पर सवार थी, अर्थात् उसकी पत्‍नी परम सुन्‍दरी थी। यह खूबसूरत बला ओर पाश्‍चात्‍य शिक्षा दोनों उसके पीछे ऐसी पङी थीं कि तोबा भली। खर्च सीमा से ज्‍यादा। तनिक शरीर गर्म हुआ और झट सरकारी डॉक्‍टर खट-खट करते आ पहुँचे।
शादी शायद आपकी भी हो चुकी है। आपको भी वास्‍तव में यह अनुभव हो गया है कि स्‍त्री कठोर आदत वाले पति को सर्वदा पसन्‍द करती है। वह अभागा व्‍यक्ति जो अपनी पत्‍नी के प्‍यार से वंचित हो, यह न समझ बैठे कि वह इस धन से मालामाल नहीं या सौन्‍दर्य से वंचित है। यकीन कीजिए वह अपनी सीमा से अधिक कोमल प्रकृति और प्रेम के कारण इसी दुर्भाग्‍य में फंसा हुआ है। मैंने इस विषय में खूब सोचा है और इस बात पर पहुँचा हूँ और यह भी सही। पूछिये क्‍यों? इस प्रश्‍न का संक्षिप्‍त और विस्‍तृत उत्तर इस तरह है।
यह तो आप जरूर मानेंगे कि कोई भी आदमी उस समय तक वास्‍तविक खुशी हासिल नहीं कर सकता, जब तक की उसे अपने जन्‍मजात विचार और स्‍वाभाविक योग्‍यताओं को प्रकट करने के लिए एक विस्‍तृत क्षेत्र न हो। हरिण को आपने देखा है वह अपने सींगों को वृक्ष से रगङकर आनन्‍द प्राप्‍त करता हैं। नर्म और नाजुक केले के खम्‍भे से नहीं। सृष्टि के आरम्‍भ से ही नारी जाति इस जंगी और कठोर स्‍वभाव पुरूष के जीतने के लिए खास तरीके से सीखती चली आ रही है। अगर उसे पहले से ही आज्ञाकारी पति मिल जाये तो उसके वे आकर्षक हथकंडे जो उसको मॉ और दादियों से बपौती रूप में मिले हैं, और लम्‍बे वक्‍त से लगातार चलते रहने की वजह से हद से अधिक सच भी सिद्ध हुए हैं, न सिर्फ बेकार रह जाते हैं, बल्कि स्‍त्री को भारस्‍वरूप मालूम होने लगते हैं।
औरत अपने अपूर्व सौन्‍दर्य के बल पर व्‍यक्ति का प्रेम ओर उसकी आज्ञाकारिता प्राप्‍त करना चाहती हैं लेकिन जो पति स्‍वयं ही उनके सौन्‍दर्य के सामने झुक जाये, वह वास्‍तव में दुर्भाग्‍यशाली होता है, और उससे ज्‍यादा उसकी पत्‍नी।
वर्तमान सभ्‍यता ने प्रभु प्रदत्त उपहार अर्थात् ‘पुरूष की सुन्‍दर कठोरता’ उससे छीन ली है। पुरूष ने अपनी निर्बलता से नारी के दाम्‍पत्‍य बन्‍धन को किसी हद तक ढीला कर दिया हैं मेरी इस कहानी का अभागा फणीभूषण भी इस नई सभ्‍यता की छजना से छला हुआ था और यही कारण था कि न वह अपने कारोबार में सफल था और न गृहस्‍थ जीवन से सन्‍तुष्‍ट। यदि एक तरफ वह अपने कारोबार मे फायदे से बेखबर था तो दूसरी ओर अपनी पत्‍नी के पतित्‍व हक से खफा।
फणीभूषण की पत्‍नी मनीमलिका को प्‍यार और विलास की सामग्री बिना माँगे मिली थी। उसे सुन्‍दर और कीमती साङियों के लिए अनुनय-विनय तो क्‍या पति से कहने की आवश्‍यकता न होती थी। सोने के आभूषणों के लिए उसे झुकना न पङता था। इसलिए उसके स्त्रियोचित स्‍वभाव को अनुमति देने वाले स्‍वर का जीवन में कभी अहसास न हुआ था, यही कारण था कि वह अपनी प्‍यार की भावनाओं में आवेश की स्थिति उत्‍पन्‍न न कर पाती थी। उसके कान-‘लो स्‍वीकार करो’ के मधुर शब्‍दों से परिचित थे, लेकिन उसके होंठ लाओ’ ओर ‘दो’ से सर्वथा अपरिचित। उसके सीधे स्‍वभाव का पति इस झूठी भावना की कहावत में प्रसन्‍न था कि ‘कर्म किये जाओ फल की कामना मत करो, तुम्‍हारा परिश्रम कभी अकारथ नहीं जाएगा।’ वह इसी मिथ्‍या भावना के पीछे हाथ-पैर मारे जा रहा था। अन्‍जाम यह हुआ कि उसकी पत्‍नी उसे ऐसी मशीन समझने लगी जो बिना चलाए चलती है। स्‍वयं ही बिना कुछ कष्‍ट किये सुन्‍दर साङियॉ और कीमती आभूषण बनाकर उसके कदमों पर डालती रही। उसके पुर्जे इतने शक्तिशाली और टिकाऊ थे कि कभी भी उनको तेल देन की जरूरत न होती।



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फणीभूषण की जन्‍मभूमि और रहने की जगह पास ही एक देहात का गाँव था, लेकिन उसके चाचा के व्‍यापार का मुख्‍य स्‍थान यही शहर था। इसी वजह से उसकी उम्र का अधिक भाग यहीं गुजरा था। वैसे मॉ मर चुकी थी,
 किन्‍तु मौसी और मामिया आदि ईश्‍वर की कृपा से विद्यमान थीं, परन्‍तु वह शादी के बाद ही तुरन्‍त मनीमलिका को अपने साथ ले गया। उसने शादी अपने सुख के लिए की थी न कि अपने सम्‍बन्धियों की सेवा के लिए।
पत्‍नी और उसके अधिकारों में जमीन-आसमान का फर्क है। पत्‍नी को प्राप्‍त कर लेना और फिर उसकी देखभाल करना, उसको अपना बनाने के लिए बहुत नही हुआ करता।
मनीमलिका सोसायटी की ज्‍यादा भक्‍त न थी। इसलिए बेकार का व्‍यय भी न करती थी, बल्कि इसके प्रतिकूल बङी सावधानी रखने वाली थी। जो उपहार फणीभूषण उसको एक बार ला देता फिर क्‍या मजाल कि उसको हवा भी लग जाए। वह सतर्कता से सब रख दिया जाता। कभी ऐसा नही देखा गया कि किसी पङोसिन को उसने खाने पर बुलाया हो। वह उपहार अथवा भेंट लेने-देने के पक्ष में भी न थी।
सबसे अधिक आश्‍चर्य की बात यह थी कि चौबीस साल की उम्र में भी मनीमलिका चौदह वर्ष की खूबसूरत युवती दिखाई देती थी। ऐसा मालूम होता मानो उसका रूप-लावण्‍य केवल स्‍थायी ही नहीं, बल्कि चिरस्‍थायी रहने वाला है। मनीमलिका के पार्श्‍व में ह्रदय न था बर्फ का टुकङा था, जिस पर प्‍यार की कुछ भी आँच न पहॅुची थी। फिर वह पिघलता क्‍यों और उसका यौवन ढलता किस तरह?
जो वृक्ष पत्तों से लदा होता है अक्‍सर फल से वंचित रहता है। मनीमलिका का सौन्‍दर्य भी फलहीन था। वह संतानहीन थी। रख-रखाव और व्‍यक्तिगत देखरेख करती भी तो काहे की? उसका सारा ध्‍यान अपने जेवरों पर ही केन्द्रित था। संतान होती तो बसन्‍त की मीठी-मीठी धूप की तरह उसके बर्फ के ह्रदय को पिघलाती और वह साफ जल उसके गृहस्‍थी जीवन के मुरझाए हुए वृक्ष को हरा कर देता।
मनीमलिका गृहस्‍थ के कामकाज और परिश्रम से भी न कतराती थी। जो काम वह स्‍वयं कर सकती उसका पारिश्रमिक देना उसे खलता था। दूसरों के दुख का न उसे ध्‍यान था और न नाते-रिश्‍तेदारों की चिंता। उसको अपने काम से काम था। इस शांति जीवन की वजह से वह स्‍वस्‍थ और सुखी थी। न कभी फिक्र होती थी, न कोई दुख।
प्राय: पति इसे सन्‍तोष तो क्‍या सौभाग्‍य समझेंगे? क्‍योंकि जो पत्‍नी हर वक्‍त फरमाइशें लेकर पति की छाती पर सपर रहे वह सारे गृहस्‍थ के लिए एक सिरदर्द साबित होती हैं।
कम-से-कम मेरी तो यही सलाह है कि हद से अधिक हुआ प्रेम पत्‍नी के लिए सम्‍भवतगौरव की बात हो, लेकिन पति के लिए एक मुसीबत से कम सोचिए तो सही कि क्‍या पुरूष का यही कार्य रह गया है कि हर वक्‍त यही तोलता-जोखता रहे कि उसकी पत्‍नी उसे कितना प्रेम करती है, मेरा तो यह दृष्टिकोण है कि गृहस्‍थ का जीवन उस सम अच्‍छा व्‍यतीत होता है जब पति अपना काम करे ओर पत्‍नी अपना।
नारी का सौन्‍दर्य और प्रेम तिरिया-चरित्र आदमी की बुद्वि से ऊपर की चीज है, लेकिन स्‍त्री-पुरूष के प्रेम के उतार-चढाव और उसके न्‍यूनाधिक अन्‍तर को गम्‍भीर दृष्टि से देखती रहती है। वह शब्‍दों के लहजे ओर छिपी हुई बात के अर्थ को तुरन्‍त अलग कर लेती हैं उसका कारण सिर्फ यह है कि जीवन के वपार मे स्‍त्री की पूँजी ले-देकर केवल व्‍यक्ति का प्‍यार हैं यही उने जीन का एकमात्र सहारा हैं यदि वह पुरूष की रूचि के वायु प्रवाह को अपनी जीवन-नैया के वितान से स्‍पर्श करने मे कामयाब हो जाए तो विश्‍वस्‍तत नैया अभिप्राय के तट तक पहुँच जाती हैं इसीलिए प्रेम की कल्‍पनात्‍मक मशीन पुरूष के लिद में नहीं, स्‍त्री के ह्रदय में लगायी गई हैं।
प्रकृति ने पुरूष और नारी की रूचि में स्‍पष्‍ट रूप से अन्‍तर रखा है, किन्‍तु पाश्‍चात्‍य सभ्‍यता इस स्‍त्री-पुरूष के फर्क को मिटा देने पर तुली हुई हैं। स्‍त्री-पुरूष बनी जा रही है और पुरूष-स्‍त्री। स्‍त्री पुरूष के चरित्र और उसके कार्य क्षेत्र को अपने जीवन की पूँजी और पुरूष स्त्रियोचित चरित्र तथा नारी कर्म क्षेत्र को अपनी जिन्‍दगी का सुख समझने लगे हैं। इसलिए यह मुश्किल हो गया है कि शादी के समय कोई यह कह सके कि वधू स्‍त्री है या स्‍त्रीनुमा स्‍त्री पुरूष। इसी तरह स्‍त्री अनुमान लगा सकती है कि जिसके पल्‍ले वो बंध रही है वह पुरूष है या पुरूषनुमा नारी। इसलिए कि अन्‍तर केवल दिल का हैं पर क्‍या जाने कि व्‍यक्ति का दिल मरदाना है या जनाना?
मैं काफी देर से आपको सूखी बातें सुना रहा हॅू, परन्‍तु किसी हद तक माफी के योग्‍य भी हॅू। मैं अपनों से दूर निर्वासित जीवन गुजार रहा हॅू। मेरी दशा उस तमाशा देखने वाले दर्शक के समान है, जो दूर से गृहस्‍थ जीवन का तमाशा देख रहा हो और वह उसके गुणों से लाभ उठाकर केवल उसके लिए सोच सकता हो। सीलिए दाम्‍पत्‍य–जीवन पर मेरे ख्‍याल अत्‍यन्‍त गम्‍भीर हैं। मैं अपने शिष्‍यों के सम्‍मुख तो वह विचार प्रकट कर नही सकता, इसी कारण आपके सामने जाहिर करे अपने ह्रदय को हल्‍का कर रहा हॅू। आप छुट्टी के वक्‍त इन पर विचार करें।
सांराश यह है कि यद्यपि गृहस्‍थ-जीवन में प्रकट रूप में कोई दु:ख फणीभूषण को न था। समय पर भोजन मिल जाता, घर की व्‍यवस्‍था सुचारू रूप से चल रही थी, किन्‍तु फिर भी एक प्रकार की बेचैनी और अविश्‍वास उसके ह्रदय में समाया हुआ था। और वह नहीं समझ पाता था कि वह है क्‍या? उसकी स्थिति उस बच्‍चे के समान थी जो रो रहा बैठे और नही जानता कि उसके ह्रदय में कोई ख्‍वाहिश है या नहीं।
अपनी जीवनसंगिनी के ह्रदय के घररूपी वाली स्‍थान को वह सुनहरे और मूल्‍यवान आभूषणों तथा इसी प्रकार के अन्‍य इनामों से भर देना चाहता था। उसका चाचा दुर्गामोहन दूसरी तरह का आदमी था। वह अपनी पत्‍नी के प्‍यार को किसी भी कीमत पर क्रय करने के पक्ष में न था और न ही वह प्रेम के बारे में चिङचिङे स्‍वभाव का था। फिर भी अपनी जीवनसंगिनी के प्रेम को पाने के लिए भाग्‍यशाली था।
जिस प्रकार एक कामयाब दुकानदार को कहीं तक बे-लिहाज होना जरूरी है, ठीक उसी प्रकार एक सफल पति बनने के लिए पुरूष को कहीं तक सख्‍त स्‍वभाव बन जाना भी बहुत जरूरी है। प्रार्थनापूर्वक तुमको में यह सीख देता हॅू। ठीक उसी वक्‍त गीदङो की चीख-पुकार जंगल में सुनाई दी। ऐसा ज्ञात होता था कि या तो वे उस स्‍कूल के अध्‍यापक के दाम्‍पत्‍य जीवन के मनोविज्ञान पर घिनौना उपहास कर रहे हैं या फणीभूषण की कहानी के प्रवाह को कुछ पलों के लिए उस चीख-पुकार से रोक देना चाहते हैं। फिर भी काफी जल्‍दी वह चीख पुकार रूक गई और पहले से भी गहन अंधेरी और शून्‍यता वायुमण्‍डल पर छा गई, किन्‍तु स्‍कूल के टीचर ने कहानी दोबारा आरम्‍भ की-
अचानक फणीभूषण के बङे कारोबार में शिक्षाप्रद अवनति दृष्टिगोचर हुई। यह क्‍यां हुआ? इसका जवाब मेरी समझ से परे है। संक्षिप्‍त में यह कि बुरे वक्‍त ने उसके लिए बाजार में सीखना कठिन कर दिया। यदि किसी तरह कुछ दिनों के लिए वह बङी पूँजी हासिल करके मण्डियों में फैला सकता, तो  हो सकता था कि बाजार से माल को न खरीदने के तूफान से बच निकलता, लेकिन इतनी बङी रकम का तुरन्‍त प्रबन्‍ध करना खाला का घर न था। यदि स्‍थानीय साहूकारों से कर्ज माँगता तो अनेक तरह की अफवाहें फैल जातीं-और उसकी साख को असहनीय हानि पहुँचातीं। यदि पत्र-व्‍यवहार से भुगतान का ढंग करता तो रूक्‍का या परचे के बिना सम्‍भव न था और इससे उसकी ख्‍याति को काफी बङा आघात पहुँचे की सम्‍भावना थी। केवल एक चाल थी कि पत्‍नी के गहनों पर रूपया प्राप्‍त किया जाए और वह विचार उसके ह्रदय में दृढ हो गया।
फणीभूषण मनीमलिका के पास गया। मगर वह ऐसा पति न था कि पत्‍नी से स्‍पष्‍ट और सबलता से कह सके। दुर्भाग्‍यवश उसे अपनी पत्‍नी से उतना गहरा प्‍यार था जैसा कि उपन्‍यास के सिकी नायक को नायिका से हो जाता है। सूर्य का आकर्षण पृथ्‍वी पर बहुत अधिक है, किन्‍तु अधिक प्रभावशाली नहीं। यही हालत फणीभूषण के प्रेम की थी। उस प्रेम का मनीमलिका के ह्रदय पर कोई प्रभाव न था। किन्‍तु मरता क्‍या न करता, आर्थिक मुश्किल की चर्चा, प्रोनोट, कर्जे का कागज, बाजार के उतार-चढाव के दशा, इन सब बातों को कम्पित तथा अस्‍वाभाविक स्‍वर में फणीभूषण ने अपनी बहू को बताया। झूठे मन, असत्‍य ख्‍याल और भावावेश मे साधारण-सी समस्‍या कठिन बन गई। अस्‍पष्‍ट शब्‍दों में विषय की गम्‍भीरता बताकर डरते-डरते अभागे फणीभूषण ने कहा-‘तुम्‍हारे गहने!’ 
मनीमलिका ने ‘हाँ’ कही और न ‘ना’ और न उसके मुख से कुछ ज्ञात होता था। उस पर गहरी खामोशी छाई हुई थी। फणीभूषण के दिल को गहरी ठेस पहुँची; किन्‍तु उसने जाहिर न होने दिया। उसमें पुरूषों की-सी वह हिम्‍मत न थी कि प्रत्‍येक वस्‍तु का वह प्रतिदिन निरीक्षण करता। उसके इन्‍कार पर उसने किसी प्रकार की चिंता प्रदर्शित न की। वह ऐसे विचारों का आदमी था कि प्रेम के संसार में शक्ति और आधिक्‍य से काम नही चल सकता। पत्‍नी की मंजूरी के बिना वह आभूषणों को छूना भी पाप समझता था। इसलिए हताश होकर रूपये को प्राप्‍त करने के लिये युक्तियाँ सोचकर कलकत्ता चला गया।

पत्‍नी अपने पति को जानती है, उसकी नस-नस से वाकिफ होती है, मगर पति अपनी पत्‍नी के चारित्र्य का इतना गम्‍भीर अध्‍ययन नहीं कर सकता। अगर पति कुछ गम्‍भीर व्‍यक्ति हो तो पत्‍नी के परित्र के कुछ हिसे उसकी तेज नजर से बचाकर जान लेता है। शायद यह सच है कि मनीमलिका ने फणीभूषण को अच्‍छी प्रकार न समझा। एक पाश्‍चात्‍य व्‍यक्ति का व्‍यक्तित्‍व बेवकूफ स्‍त्री के अन्‍धविश्‍वास जैसे जीवन और उसकी समझ-बूझ से अक्‍सर ऊँचा होता है। वह खुद स्‍त्री की तरह एक रोमाँचकारी व्‍यक्ति बनकर रह जाता है-और इसी  कारण पुरूष की उन हालातों में किसी में भी फणीभूषण को पूरी तरह शामिल नहीं किया जा सकता।
वेबकूफ-अन्‍धा-जंगली!
मनीमलिका ने अपने बङे सलाहकार मधुसूदन को बुलाया। यह दूर के रिश्‍ते से चचेरा भाई था तथा फणीभूषण के कारोबार में एक आसामी की तरह देख-रेख पर नियुक्‍त था। काबिलियत की वजह नहीं, बल्कि रिश्‍तेदारी के जोर पर वह उस आसामी पर हक जमाये हुए था। काम की चतुराई के कारण नहीं, बल्कि रिश्‍तेदारी की धौंस में हर महीने वेतन से भारी अधिक रकम ले उङता था। मनीमलिका ने सारी रामकहानी उसको सुनाई और अन्‍त में पूछा-क्‍या करूँ कोई अच्‍छी सलाह दो।
मधु ने बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता के तरीके से सिर हिलाकर कहा-मेरा माथा ठनकता है, इस मामले में कुशल दिखाई नहीं देतीं आप।’’
‘’सांसारिक समस्‍याओं एवं पुरूष तथा नारी के सम्‍बन्‍ध में जो मनीमलिका के अपने व्‍यक्तिगत ख्‍याल थे, उनके प्रकाश में मधु के निकाले हुए परिणाम का फहला भाग सम्‍भावित ओर दूसरा सच प्रतीत होता था। यकीन उसके ह्रदय से जाता रहा था, स्‍नतान उसके थी ही नहीं, शेष रहा पति, वह किसी गिनती में न था। इसलिए कि उसका सारा ध्‍यान अपने गहनों पर केन्द्रित था। इन्‍हीं से उसके ह्रदय की प्रसन्‍नता थी, ये ही उसकाे सन्‍तान के समान प्‍यारे थे। सन्‍तान को माँ से छी लीजिए फिर देखिए ममता की क्‍या दशा होती है। यही दशा मनीमलिका की थी। उसका यह विचार था कि उसके आभूषण पति के मनसूबों की भेंट हो जायेंगे।
फिर मुझे क्‍या करना चाहिए?
अभी मैके चली जाओ, सारे गहने वहाँ छोङ आओ।चालाक मधु ने कहा। इस तरह उसकी हाँडी को भी बघार लगता है। यदि सारे नहीं तो कुछ आभूषण मधु को अपने हत्‍थे चढने की आशा थी। मनीमलिका उसी वक्‍त राजी हो गई।

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बढते हुए अंधकार से स्‍कूल के अध्‍यापक पर भी गम्‍भीरता छा गई थी, लेकिन कुछ पलों के बाद उसने फिर वर्णन आरम्‍भ किया-
झुटपुटे के वक्‍त जब कि सावन की घटाएँ आसमान पर डेरा जमाए हुए थीं। बारिश मूसलाधार हो रही थी, एक नौका ने रेतीली सीढियों पर लंगर डाला। दूसरे रोज सुबह घटाघोप अंधेरे में मनीमलिका आई तथा एक मोटी चादर में सिर से पेर तक लिपटी हुई नाव पर सवार हो गई।
मधु जो रात से उसी नाव में सोया हुआ था, उसकी आहट से जाग गया।
गहनों की सन्‍दूकची मुझे दे दो, ताकि सुरक्षित रख लूं।
अभी ठहरो, तीव्रता क्‍या है? चलो तो सही, आगे देखा जायेगा।
नाव का लंगर उठा और वह आवाज हुई नदी की लहरों से जूझने लगी। मनीमलिका ने सारे गहने एक-एक करके पहन लिये थे। सन्‍दूक में बन्‍द करके ले जाना असुरक्षित प्रतीत होता है। मधु हक्‍का-बक्‍का रह गया, जब उसने देखा कि मनी के पास सन्‍दूकची नहीं है। इसकी कल्‍पना भी न थी कि उसने गहनों को अपने प्राणों से लगा रखा है।
चाहे मनीमलिका ने फणीभूषण को न समझा था लेकिन मधु के चरित्र का एक बिल्‍कुल ही सही अंदाजा लगाया था।
जाने से पहले मधु ने फणीभूषण के एक विश्‍वासी मुनीम को लिख भेजा था कि मैं मनीमलिका के साथ उसको मैके पहुँचाने जा रहा हूँ। यह मुनीम जगत का अनुभवी और बङी आयु का था और फणीभूषण के पिता के समय से ही उसके साथ था। उसको मनीमलिका के जाने से बहुत चिन्‍ता और सन्‍देह हुआ। उसने अपने मालिक को फौरन लिखा। वफादारी और खैरख्‍वाही से उसे प्रेरणा दी और अपने खत में अपने मालिक को खूब खरी-खरी सुनाई। पति की लाज और दूरदर्शिता दोनों का यह मतलब नहीं है कि पत्‍नी को इस प्रकार आजाद छोङ दिया जाये। मनीमलिका के मन के सन्‍देह को फणीभूषण समझ गया, उसे बहुत दु:ख हुआ। वह इस सम्‍बन्‍ध में एक अल्‍फाज भी शिकायत का जबान पर न लाया। अपमान और कष्‍ट सहे, किन्‍तु उसने मनीमलिका पर कोई दबाव डालना सही न समझा, किन्‍तु फिर भी इतना अविश्‍वास! सालों से वह मेरे एकान्‍त की तरफ सांसारिक साथी रही हैं। हैरानी है कि उसने मुझे कुछ भी न समझा।
इस मौके पर कोई और होता तो क्रोधावेश में न जाने क्‍या कर बैठता, लेकिन फणीभूषण मौन था और अपना दु:ख प्रकट करके मनीमलिका को पीङित करना ठीक न समझा।
पुरूष को चाहिए कि यह दावानल की तरह जरा-जरा-सी बात पर भङ‍क जाए। जिस प्रकार औरत सावन के बादलों की तरह बात-बात पर आंसुआं की झङी लगा देती है, लेकिन अब वह पहले के दिन कहाँ? फणीभूषण ने मनीमलिका को उसकी गैरमौजुदगी में बिना सूचना दिए जाने के विषय मे कोई डांट-फटकार का खत न लिखा, बल्कि यह तय कर लिया कि मरते दम तक उसके गहनों का नाम तक जबान पर न लायेगा। रूपये की वसूली में फणीभूषण सफल हो गया। उसके कारोबारी मार्ग खुल गए कि आभूषण मैके में छोङकर मनीमलिका अपने घर को वापस आ गई होगी।
दस दिन पहले का तुच्‍छ और कामयाब प्रश्‍नकार्ता जब मस्‍तानी चाल से घर में कदम रखेगा और पत्‍नी की दृष्टि उसकी कामयाबी से दमकते हुए मुख पर पङेगी, तो वह अपने इनकार पर खुद लज्जित होगी ओर अपनी नादानी पर पश्‍चाताप प्रकट करेगी। इन विचारों में मग्‍न फणीभूषण सोने के कमरे में पहुँचा, परन्‍तु दरवाजे पर ताला लगा हुआ था। ताला तुङवाकर भीतर घुसा तो तिजोरी के किवाङ खुले पङे थे।
इस आघात से वह ल्रङखङा गया-‘शुभ चिंता तथा प्रेम’ उस वक्‍त उसके पास निरर्थक और अस्‍पष्‍ट अल्‍फाज थे। सोने का पिंजरा, जिसकी प्रत्‍येक सुनहरी तीली को उसने अपने प्राण और आन की कीमत देकर प्राप्‍त किया था, टूट चुका था और खाली पङा था। अब दिवालिया हो चुका था और सिवाय गहरी सांस, और आंसू ओर दिल की गहरी वेदना के अतिरिक्‍त उसके पास कुछ न था।
मनीमलिका को बुलाने का ध्‍यान भी उसके दिल मे न आया। उसने यह तय कर लिया कि वह चाहे आए या न आ, लेकिन बूढा मनीम इस फैसले के खिलाफ था। वह विनती कर रहा था कि कम-से-कम कुशलक्षेम अवश्‍य पूछनी चाहि। इतनी देरी की कोई वजह समझ में नहीं आती। उसके अनुरोध से विवश होकर मनीमलिका के मैके को व्‍यक्ति भेजा गया, किन्‍तु वह अशुभ समाचार लाया कि न यहाँ मनीमलिका आई है और न मधु।
यह सुना तो पांव-तले की धरती निकल गई। नदी पार आदमी दौङाये गये। खोज और प्रयत्‍न में किसी तरह की कमी न रखी, किन्‍तु पता न चलना था और न चला। यह भी प्रतीत न हो सका कि नौका किस दिशा में गई है और नौका का नाविक कौन था?
हताशा फणीभूषण दिल मसोस कर बैठ गया।

कृष्‍ण-जन्‍माष्‍टमी की शाम थी। वारिश हो रही थी। फणीभूषण शयनकक्ष में अकेला था। गाँव में एक आदमी भी शेष न था। जन्‍माष्‍टमी के मेले ने गाँव-का-गाँव सूना कर दिया था। मेले की चहल-पहल और महाभारत के नाटक के चाव ने बच्‍चे से लेकर बूढे तक को खींच लिया था। सोने वाले कमरे की खिङकी का एक किवाङ बन्‍द था। फणीभूषण दीन-दुनिया से अन्‍जान बैठा था।
शाम का झुटपुटा रात के गहन अंधेरे में बदल गया। लेकिन इस डरावने अंधेरे, मूसलाधार बारिश और ठंडी वायु का उसको ध्‍यान भी न था। दूर से गाने की मीठी ध्‍वनि से उसकी श्रवण-शक्ति चारों तरफ से बेसुध थी।
दीवार पर विष्‍णु और लक्ष्‍मी के चित्र लगे हुए थे। फर्श स्‍वच्‍छ था और प्रत्‍येक वस्‍तु की सही स्‍थान पर रखी हुई थी।
पलंग के पास एक खूंटी पर एक खूबसूरत और आकर्षक साङी लटकी हुई थी। सिरहाने एक छोटी-सी मेज पर पान का बीङा स्‍वयं मनीमलिका के हाथ का बना हुआ रखा-रखा सूख रहा था।
विभिन्‍न चीजें सलीके से अपने-अपने स्‍थान पर रखी हुई थीं। एक ताख में मनीमलिका का प्‍यरा लैम्‍प रखा हुआ था। जिसको वह अपने हाथ से प्रकाशित किया करती थी और जो उसकी आखिरी विदाई का स्‍मरण करा रहा था। मनी की याद में सम्‍पूर्ण वस्‍तुओं का मौन-रूदन उस कमरे को कामना का शोक-स्‍थान बनाए हुए था। फणीभूषण का ह्रदय स्‍वयं कह रहा था-प्‍यारी मनी, आओ और अपने प्राणमय सौन्‍दर्य से इन सब में प्राण फूंक दो।
कहीं आधी रात के लगभग जाकर बूंदों की तङतङ थमी, लेकिन फणीभूषण उसी ख्‍याल में खोया बैठा था।
अंधेरी रात के असीमित धुंधले वायुमण्‍डल पर मौत के राज का सिक्‍का चल रहा था। फणीभूषण की दु:खती हुई आत्‍मा का रूग्‍ण स्‍वर इतना पीङामय था कि अगर मृत्‍यु की नींद सोने वाली मनीमलिका भी सुन पाये तो एक बार आँखें खोल दे तथा अपने सोने के गहने पहने हु उस अंधेरे में ऐसी प्रकट हो जैसे कसौटी के सख्‍त पत्‍थर पर किंचित सुनहरी रेखा।

अचानक फणीभूषण के कान में किसी के पांवों की-सी आहट सुनाई दी। ऐसा मालूम होता था कि नदी-किनारे से उस घर की ओर वापस आ रही है। नदी की काली लहरें रात की अंधेरी में मालूम न होती थीं। आशा की खुशी ने उसे जीवित कर दिया। उसकी आँखें नमक उठीं। उसने अन्‍धकार के पर्दे को फाङना चाहा, किन्‍तु बेकार। जितन अधिक वह नेत्र फाङकर देखता था, अन्‍धकार के पर्दे और ज्‍यादा गहन होते जाते थे-और यह मालूम होता था कि प्रकृति इस भयावनी अंधेरी में मनुष्‍य के हस्‍तक्षेप के विरूद्ध विद्रोह कर रही है। आवाज निकट से समीपतर होती गई। यहाँ तक कि सीढियों पर चढी और सामने द्वार पर आकर रूक गई, जिस पर ताला लगा हुआ था, द्वारपाल भी मेले में गया था। दरवाजे पर धीमी-सी खुट-खुट सुनाई दी। ऐसी जैसी आभूषणों से सुसज्जित औरत का हाथ द्वार खटखटा रहा हो। फणीभूषण सहन न कर सका। जीने उतरकर बरामदे से होता हुआ द्वार पर पहुँचा। ताला बाहर से लगा हुआ था। पूरी ताकत से उसने द्वार हिलाया। शोरगुल से उसका ख्‍वाब टूटा तो वहाँ कुछ न था।
वह पसीने से भीगा हुआ था, हाथ-पांव ठंडे पङे हुए थे। उसका दिल टिमटिमाते हुए दीपक के आखिरी प्रकाश की तरह जलकर बुझने को तैयार था। बारिश की तङतङ ध्‍वनि के अतिरिक्‍त उसे कुछ भी सुनाई न देता था। फणीभूषण से वह वास्‍तविकता किंचित मात्र व विस्‍मृत न हुई थी कि उसकी अधूरी ख्‍वाहिशें पूरी होते-होते रह गई।

अगली रात को फिर नाटक होने लगा, नौकर ने इजाजत तो चेतावनी दे दी कि बाहर का दरवाजा खुला रहे।
यह कैसे हो सकता है! विभिन्‍न स्‍वभाव के लोग बाहर से मेले में आये हुए हैं, कोई भी घटना घट सकती है।नौकर ने बताया।
नहीं, तुम अवश्‍य खुला रखो।
तो फिर मैं मेले में नहीं जाऊँगा।
तुम अवश्‍य जाओ।
नौकर आश्‍चर्य में था कि आखिर उनका मतलब क्‍या है?
जब शाम हो गई और चारों तरफ अन्‍धकार छा गया तो फणीभूषण उस खिङकी में आ बैठा। आकाश पर गहरा कोहरा छाया हुआ था, घनघोर घटाएँ ऐसी तुली खङी थीं कि जल-थल एक कर दें, चारों ओर शून्‍यता का राज्‍य था। ऐसा मालूम होता था कि सारे संसार का वायुमण्‍डल मौन भाव से किसी सुरीली आवाज को सुनने के लिए अपने कान लगाये हुए है। मेढकों की बराबर टर्र-टर्र और ग्रामीण स्‍वांगों की कम्पित ध्‍वनि भी उस शून्‍यता में बाधक न प्रतीत होती थी।
आधी रात के वक्‍त फिर सम्‍पूंर्ण शोर, चहल-पहल रात्रि के मौन में सोने लगा। रात ने अपने काले कपङे पर एक और काला आवरण डाल लिया। पहली रात की भाँति फणीभूषण को फिर वही आवाज सुनाई दी। उसने नदी की तरफ नजर उठकार भी न देखा। भगवान न करे कि कोई अनधिकार-चेष्‍टा द्वारा समय से पूर्व की उसकी आकांक्षाओं का खून कर दे। वह मूर्तिवत् बैठा रहा, जैसे किसी ने लकङी की मूर्ति को बनाकर गोंद से कुर्सी से चिपका दिया हो।
पंजों की आहट सुनसान घाट की सीढियों की तरफ से आकर मुख्‍य दरवाजे में प्रविष्‍ट हुई। चक्‍कर वाले जीने की सीढियों पर चढकर भीतर के कमरे की तरफ बढी। लहरों की प्रतिस्‍पर्धा में आपने नाव को देखा होगा। इसी प्रकार फणीभूषण का ह्रदय बल्लियों उछलने लगा। वह आवाज बरामदे से होती हुई शयनकक्ष की तरफ आई और ठीक द्वार पर आकर ठहर गई। अब सिर्फ द्वार-प्रवेश करना बाकी था।
फणीभूषण की आकांक्षाएँ मचल उठीं। संतोष का ऑचल हाथ से फिसल गया, वह अचानक कुर्सी से उछल पङा। एक दु:खभरी चीख-‘मनी’ उसके मुँह से निकली, किन्‍तु दु:ख है कि उसके बाद मेंढकों की आवाज और बारिश की बङी-बङी बूंदों की तङतङ के अतिरिक्‍त और कुछ न था।

दूसरे रोज मेला छँटने लगा, दुकानें उठनी शुरू हो गईं, मेला देखने वाले अपने-अपने घरों को वापस जाने लगे। मेले की शोभा समाप्‍त हो गई।
फणीभूषण ने दिन मे व्रत रखा और सब नौकरों को अनुमति दे दी कि आज रात को कोई भी व्‍यक्ति न रहे। नौकरों का ख्‍याल था कि हमारे मालिक आ ज किसी खास मंत्र का जाप करेंगे।
शाम के वक्‍त जब कहीं भी आसमान की टुकङियों पर बादल न थे, वर्षा से धुले हुए वायुमण्‍डल से सितारे चमकने लगे थे, पूर्णिमा का चाँद निकला हुआ था, वायु भी मंद-मंद बह रही थी, मेले से लौटे हुए दर्शक अपनी थकान उतार रहे थे। वे बेसुध हुए सो रहे थे तथा नदी पर कोई नाव दिखाई न देती थी।
फणीभूषण उसी खिङकी में आ बैठा और तकिये से सिर लगाकर आसमान की तरफ ध्‍यान से देखने लगा। उसको उस वक्‍त वह समय याद आया जब वह कॉलेज में शिक्षा हासिल कर रहा था। शाम के समय चौक में लेटकर अपनी भुजा पर सिर रखकर झिलमिलाते हुए सितारो को देखकर मनीमलिका की खूबसूरत कल्‍पना में खो जाया करता था। उन दिनों कुछ वक्‍त का विछोह मिलन की आशाओं को अपने आँचल मे लिये बहुत ही प्‍यारा मालूम हुआ करता था, लेकिन वह सब कुछ अब स्‍वप्‍न मालूम होता था।
सितारे आसमान से अदृश्‍य होने लगे, अन्‍धकार ने दायें-बायें और नीचे-ऊपर चारों तरफ से पर्दे डालने आरम्‍भ कर दिये और ये पर्दे आँख की पलकों की भाँति परस्‍पर मिल गये। जगत् शराबी हो गया।
लेकिन आज फणीभूषण पर एक विशेष प्रकार का असर था। वह अनुभव कर रहा था कि उसकी अम्‍मीदों के पूर्ण होने का समय समीप है।
पिछली रातों की तरह सिकी के पांवों की आहट फिर स्‍नानघाट की सीढियों पर चढने लगीं, फणीभूषण ने आँखें मूंद लीं और विचारों में मग्‍न हो गया। पांव की आहट मुख्‍य द्वार से प्रविष्‍ट होकर सम्‍पूर्ण मकान में होती हुई शयनकक्ष के दरवाजे पर आकर विलीन हो गई। फणीभूषण का पूरा शरीऱ काँपने लगा, मगर वह दृढ निश्‍चय कर चुका था कि आखिर तक आँखें न खोलेगा। आहट कमरे में प्रविष्‍ट हुई, खूंटी पर की साङी, ताक के लैम्‍प, खुले हुए पानदान और दूसरी वस्‍तुओं के पास थोङी-थोङी देर ठहरी और अन्‍त में फणीभूषण की कुर्सी की ओर बढी।
अब फणीभूषण ने आँखें खोल दीं। धीमी-धीमी चाँदनी खिङकी से छनकर आ रही थी। उसकी नजर की सम्‍मुख एक ढांचा, एक हड्डियों का पंजर खङा था। उसके रोम-रोम में छल था, कलाइयों में कङे, गले में माला। सारांश यह कि हर जोङ जङाऊ आभूषणों से दमक रहा था। सम्‍पूर्ण गहने ढीले होने के कारण निकले पङते थे। आँखें वैसी ही बङी-बङी और चमकीली परन्‍तु प्रेम भावना से खाली थीं। अट्ठारह साल पूर्व विवाह की रात को शहनाइयों के मीठे स्‍वरों में इन्‍हीं मोहिनी आँखों से मनीमलिका ने फणीभूषण को सर्वप्रथम देखा था। आज वही आँखें बारिश की भीगी चाँदनी में उसके मुख पर जमी हुई थीं।
पंजर ने दायें हाथ से संकेत किया। फणीभूषण खुद चल पङने वाली मशीन की तरह उठा और पंजर के पीछे-पीछे हो लिया। हर कदम पर उसकी हड्‍डियाँ चटख रही थीं। गहने झंकृत हो रहे थे। वे बरामदे से होते हुए, सीढियों के नीचे उतरे और उसी रास्‍ते पर हो लिये जो स्‍नानघाट पर जाता था। अंधेरे में जुगनू कभी-कभी चमक उठते थे। मद्धिम धीमी चाँदनी वृक्षों के घने पत्तों में से निकलने के लिए प्रयत्‍नशील थी।
वे दोनों नदी के तट पर पहुँचे। पंजर ने सीढियों से नीचे उतरना शुरू किया। जल पर चाँदनी की छाया नदी की लहरों से क्रीङा कर रही थी। पंजर नदी में कूद पङा। उसके पीछे फणीभूषण का पैर भी नदी में गया। उसकी ख्‍वाब की छलना टूटी तो वहाँ कोई नहीं था, केवल वृक्षों की एक पंक्ति चौकीदारी कर रही थी।
अब फणीभूषण के सारे शरीर पर कम्‍पन छाया हुआ था। फणीभूषण भी एक अच्‍छा तैराक था, लेकिन अब उसके हाथ-पांव अपने बस में न थे। दूसरे ही पल वह नदी के असीम पानी मे जा चुका था।
इस दर्द से भरे हुए अन्‍त पर स्‍कूल के अध्‍यापक ने कक्षा को समाप्‍त किया। उसकी समाप्ति पर हमें फिर एक बार शून्‍य वायुमण्‍डल का अहसास हुआ। मैं भी चुपचाप था। अंधेरे में मेरे मुख के विचारों का अध्‍ययन वह न कर सकता था।
क्‍या आप इसको कहानी कहते हैं?उसने सन्‍देह की मुद्रा में पूछा।
नहीं!मैं तो इसे सच नहीं समझता, प्रथम तो इसका कारण यह है कि मेरी प्रकृति उपन्‍यास और कहानी लेखन से ऊँची है और दूसरा कारण यह है कि मैं ही फणीभूषण हूँ। मैंने बात को काटकर कहा।
स्‍कूल का अध्‍यापक कुछ अधिक व्‍याकुल नहीं था।
लेकिन आपकी पत्‍नी का नाम?उसने पूछा।
नरवदा काली।         

        


खोया हुआ मोती खोया हुआ मोती Reviewed by Kahaniduniya.com on सितंबर 25, 2019 Rating: 5

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