तुच्‍छ की भेंट


काफी सम पहले ही बात है, यमुना नदी का पानी लहरें उठाते हुए दौङा जा रहा है। दोनों किनारों पर काफी ऊँचे-ऊँचे पहाङ हैं। गुफा के तंग मार्ग में होकर जाता हुआ पानी पागल की तरह से दिन-रात गरजता रहता है।
नदी की टेढी-मेढी धारा के साथ-साथ पहाङों की श्रेणियाँ एक-के-बाद एक दूर तक फैली हुई हैं। पहाङों पर ऊँचे- ऊँचे पेङ खङे हैं, मानो पर्वत बाजू फैलाकर बादलों को बुला रहे हैं। ऐसे प्रदेश मे कुटिया बनाकर सिक्‍खों के गुरूजी यहाँ रहते हैं।
एक बार गुरूजी प्रभु-महिमा बांच रहे थे। अचानक राजा रधुनाथ आ पहुँचे। गुरूजी के चरणों में सिर रखकर राजा ने कहा, भगवान, सेवक आपके लिए छोटी-सी भेंट लाया है।

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हाथ फैलाकर गुरूजी ने राजा के माथे पर रखा, आर्शीवाद दिया तथा कुशलता पुछी। दो हीरे राजा ने गुरूजी के चरणों में रख दिये।
धरती पर से एक हीरा उठाकर गुरूजी एक अंगुली र गोल-गोल घुमाने लगे। हीरे के टुकङे की किरणें चारों तरफ घूमने लगीं, मानो जगमग करती हुई हजारों कटारें फूट रही हों।
मुस्‍कुराकर गुरूजी ने वह हीरे नीचे रख दिये और फिर किताब पढने में व्‍यस्‍त हो गये। सामने राजा रघुनाथ बैठे हैं, इसकी भी इस साधु को फिक्र नहीं हैं।
इतने में एकाएक एक हीरा खिसककर लुढकता-लुढकता यमुना के गहरे पानी में जा पहुँचा।
‘अरे-अरे’ की पुकार करके राजा रघुनाथ राव कपङों समेत पानी में कूद पङे। दोनों हाथ बढाकर हीरे की तलाश करने लगे।
गुरूजी की अन्‍तरात्‍मा के भीतर तो प्रभु की वाणी का परम आनन्‍द व्‍याप  रहा था। क्षण-भर के लिए भी उन्‍होंने किताब से अपनी आँखें नही उठायीं।
यमुना के जल मे ंबन रहे भंवर जैसे राजा को ठग रहे हैं, देख हीरा तो यहाँ पङा हुआ हैं।और राजा उस जगह पर पानी छान डालते हैं। इतने में ही मतवाली नदी दूसरी जगह पर भंवर बनाकर राजा को बहलाने लगती है, देख-देख, वहाँ नहीं, यहाँ पङा है तुम्‍हारा हीरा।
शाम ढलने को आ गयी। सूर्य भगवान विदाई माँगने लगे। मगर दिन-भर नदी में तलाश करने पर भी राजा को हीरा प्राप्‍त नहीं हुआ। खाली हाथों भीगे वस्‍त्रों में राजा गुरूजी के निकट आये। उनके दिल मे शर्म थी कि हीरा तो मिला नहीं, गुरूजी मुझे क्‍या कहेंगे।
हाथ जोङकर रघुनाथ राव बोले, महाराज, हीरा किस जगह पर गिरा है, यह बतायें, तो मैं उसे अभी ढूंढ निकालूं।
देखना वहाँ!-इस तरह कहकर गुरूजी ने दूसरे को भी युमना के पानी में फेंक दिया-वहाँ पर।
राजा शर्मिन्‍दगीभरी दृष्टि से गुरूजी को देखने लगे और गुरूजी मन्‍द-मन्‍द मुस्‍करा उठे थे। 
तुच्‍छ की भेंट तुच्‍छ की भेंट Reviewed by Kahaniduniya.com on अक्तूबर 06, 2019 Rating: 5

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