बलिदान

एक महात्मा अपने शिष्यों को कथा सुना रहे थे। चित्रकूट नगर में एक राजा एक ऋषि-कन्या से विवाह कर उसे लेकर जंगल के रास्ते जा रहा था। रास्ते में एक राक्षस मिला। तुम्हारी रानी को खाऊगा। अगर चाहते हो कि वह बच जाय तो सात दिन के भितर एक ऐसे ब्राहृण-पुत्र का बलिदान करो, जो अपनी इच्छा से अपने को दे और उसके माता पिता उसे मारते समय उसके हाथ पैर पकङे।, भयवंश राजा ने उसकी बात मान ली। वह अपने नगर को लोटा और अपने दिवान को सब हाल कह सुनाया। दीवान कहा – आप परेशान न हों, मैं उपाय करता हूँ। इसके बाद दिवान ने सात बरस के बालक की मूर्ति बनवायी और उसे किमती गहने पहनाकर नगर-नगर गांव-गांव घुमाया। यह कहलवा दिया कि जो कोई सात बरस का ब्राहृण बालक अपने को बलिदान के लिए देगा औरबलिदान के समय उसके मां-बाप उसके हाथ-पैर पकङेगे, 

उसी को यह मूर्ति और सौ गांव मिलेगें। एक बालक ने हठ कर अपने मां-बाप को राजी कर लिया। मां-बाप बालक को लेकर राजा के पास गये। राजा उन्हे लेकर राक्षस के पास गया। राक्षस के सामने माता-पिता ने बालक के हाथ-पैर पकङे और राजा उसे तलवार से मारने को हुआ। उसी समय बालक जोर से हंस पङा। इतनी कथा सुनाने के बाद महात्मा ने शिष्यों से पुछा – यह बताओं कि वह बालक क्यों हंसा। एक विदृवान शिष्य ने उतर दिया- इसलिए कि डर के समय हर आदमी रक्षा के लिए अपने मां-पिता को पुकारता है। वे न हो तो पीङितों कि मदद राजा करता है। राजा न कर सके तो आदमी देवता को याद करता है। पर यहां तो कोई भी बालक केसाथ न था। मां-बाप हाथ पकङे हुए थे, राजा तलवार लिए खङा था, और राक्षस भक्षक हो रहा था। ब्राहृण का लङका परोपकार के लिए अपना शरीर दे रहा था। इसी हर्ष और अचरज से हंसा।,
बलिदान बलिदान Reviewed by Kahaniduniya.com on मार्च 15, 2019 Rating: 5

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